संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद: विश्व शांति का संरक्षक या गतिरोध का केंद्र?
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद: गठन, शक्तियाँ, वीटो अधिकार, सुधार और विवाद | UNSC in Hindi
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की संरचना, 5 स्थायी सदस्यों की वीटो शक्ति, भूमिका, आलोचनाएँ और सुधारों पर विस्तृत जानकारी। छात्रों और प्रतियोगी परीक्षार्थियों के लिए पूर्ण मार्गदर्शन।
---
प्रस्तावना: अंतर्राष्ट्रीय शांति का 'फायर ब्रिगेड'
वैश्विक मामलों में जब भी कहीं युद्ध, संघर्ष या अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा का संकट पैदा होता है, तब दुनिया की नजरें एक ही संस्था पर टिक जाती हैं - संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (United Nations Security Council - UNSC)। संयुक्त राष्ट्र का यह सबसे शक्तिशाली अंग अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए जिम्मेदार है। लेकिन क्या यह परिषद वाकई विश्व शांति की रक्षक है, या फिर यह शक्तिशाली देशों के राजनीतिक हितों का अखाड़ा बनकर रह गई है? आइए, गहराई से समझते हैं इस 'विश्व की सर्वोच्च सुरक्षा परिषद' को।
सुरक्षा परिषद: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और गठन
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, जब संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई, तो यह स्पष्ट था कि अंतर्राष्ट्रीय शांति की जिम्मेदारी एक छोटी, तेजस्वी और शक्तिशाली इकाई को दी जाएगी। इसी सोच के तहत सुरक्षा परिषद का गठन हुआ।
· स्थापना: 1945, संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अध्याय V के तहत।
· मुख्य लक्ष्य यह है कि विश्व स्तर पर शांति और सुरक्षा को सुरक्षित और स्थिर बनाए रखा जाए।
· आधार: द्वितीय विश्व युद्ध में विजयी मित्र राष्ट्रों (Allied Powers) की केंद्रीय भूमिका को मान्यता देते हुए।
संरचना: 15 देशों की जिम्मेदारी
सुरक्षा परिषद की संरचना को समझना बेहद जरूरी है:
1. पाँच स्थायी सदस्य (Permanent Members - P5):
· देश: संयुक्त राज्य अमेरिका, रूसी संघ (पहले USSR), चीन, फ्रांस, यूनाइटेड किंगडम।
· विशेषाधिकार: इन सदस्यों के पास वीटो पावर (निषेधाधिकार) है। यही शक्ति उन्हें विशेष बनाती है।
2. दस अस्थायी सदस्य (Non-Permanent Members):
· चुनाव: संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा दो वर्ष के कार्यकाल के लिए चुने जाते हैं।
· वितरण: 10 सीटों का क्षेत्रीय आधार पर वितरण:
· अफ्रीका से 3 सदस्य
· एशिया-प्रशांत से 2 सदस्य
· लैटिन अमेरिका और कैरिबियन से 2 सदस्य
· पूर्वी यूरोप से 1 सदस्य
· पश्चिमी यूरोप और अन्य राज्यों से 2 सदस्य
· विशेषाधिकार: इनके पास वीटो पावर नहीं होती।
शक्तियाँ और कार्य: परिषद क्या कर सकती है?
सुरक्षा परिषद को अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत असाधारण शक्तियाँ प्राप्त हैं:
1. शांति बनाए रखने के उपाय:
· कूटनीतिक हल: विवादित पक्षों के बीच बातचीत, मध्यस्थता और समझौते कराना।
· प्रतिबंध (Sanctions): आर्थिक प्रतिबंध, व्यापार प्रतिबंध, हथियारों पर प्रतिबंध, यात्रा प्रतिबंध लगाना।
· सैन्य कार्रवाई: अंत में, यदि जरूरी हो, तो अध्याय VII के तहत सामूहिक सैन्य कार्रवाई का अधिकार। 1991 में इराक के खिलाफ और 2011 में लीबिया के खिलाफ कार्रवाई इसके उदाहरण हैं।
2. शांति रक्षा अभियान (Peacekeeping Operations):
· संघर्ष क्षेत्रों में 'नीले हेलमेट' शांतिसैनिकों की तैनाती। यह तभी होती है जब सभी पक्ष सहमत हों।
3. अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण:
· युद्धापराधों के मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों का गठन (जैसे- पूर्व यूगोस्लाविया और रवांडा के लिए)।
4. नए सदस्यों की सिफारिश:
· संयुक्त राष्ट्र में किसी नए देश को सदस्यता देने के लिए सुरक्षा परिषद की सिफारिश जरूरी है।
वीटो पावर: सबसे शक्तिशाली हथियार या गतिरोध का कारण?
वीटो (निषेधाधिकार) सुरक्षा परिषद की सबसे विवादास्पद और महत्वपूर्ण अवधारणा है।
· क्या है वीटो? P5 में से किसी एक देश द्वारा भी किसी 'गैर-प्रक्रियात्मक' मसले पर ना कहने की शक्ति। इस एक 'ना' से पूरा प्रस्ताव खारिज हो जाता है।
· यह क्यों दी गई? द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, बड़ी शक्तियों को यह आश्वासन दिया गया कि उनकी राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ कोई भी फैसला नहीं लिया जा सकेगा।
· विवाद क्यों है?
1. असमानता: यह शक्ति संयुक्त राष्ट्र के "सभी देश समान हैं" के सिद्धांत के विपरीत है।
2. पंगु करने की शक्ति: एक देश अपने संकीर्ण हितों में पूरी विश्व समुदाय की इच्छा को रोक सकता है।
3. राजनीतिक दुरुपयोग: वीटो का इस्तेमाल अक्सर न्याय या मानवता के बजाय रणनीतिक गठजोड़ और हितों की रक्षा के लिए होता है।
वीटो के विवादित उदाहरण:
· सीरिया युद्ध: सीरिया में असद सरकार के खिलाफ कार्रवाई के कई प्रस्तावों को रूस और चीन ने वीटो किया।
· इजराइल-फिलिस्तीन: इजराइल की कार्रवाइयों की आलोचना वाले कई प्रस्तावों को अमेरिका ने वीटो किया है।
· दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद: इस नीति के खिलाफ प्रस्तावों को अमेरिका और ब्रिटेन ने वीटो किया था।
सुरक्षा परिषद की आलोचनाएँ और चुनौतियाँ
1. पुरातन और अप्रतिनिधित्व वाली संरचना: P5 1945 की विश्व व्यवस्था को दर्शाते हैं, जबकि आज का विश्व बदल चुका है। भारत, जापान, जर्मनी, ब्राजील जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं और अफ्रीका के किसी भी देश का इसमें स्थायी प्रतिनिधित्व नहीं है।
2. चुनिंदा हस्तक्षेप: परिषद अक्सर शक्तिशाली देशों के हित वाले क्षेत्रों में हस्तक्षेप करती है, जबकि अन्य क्षेत्रों (जैसे यमन, कांगो) में निष्क्रिय रहती है।
3. नरसंहारों को रोकने में विफलता: रवांडा (1994) और स्रेब्रेनित्सा (1995) के नरसंहारों के दौरान परिषद निर्णायक कार्रवाई नहीं कर सकी।
4. शक्तिशाली देशों का हथियार: आलोचकों का मानना है कि P5 अपने हितों के लिए परिषद का इस्तेमाल करते हैं।
सुरक्षा परिषद सुधार: एक लंबी बहस
सुरक्षा परिषद के सुधार की मांग दशकों से चल रही है, लेकिन प्रगति नहीं हो पा रही है। मुख्य सुझाव हैं:
· स्थायी सदस्यता का विस्तार: G4 देश (भारत, ब्राजील, जर्मनी, जापान) और अफ्रीकी संघ के प्रतिनिधि (शायद मिस्र, नाइजीरिया, दक्षिण अफ्रीका में से) को स्थायी सीट देना।
· वीटो सुधार: वीटो को समाप्त करना, या फिर उसके उपयोग पर रोक (जैसे नरसंहार के मामलों में वीटो न चलाना), या फिर सामूहिक वीटो (दो या तीन देशों की सहमति जरूरी)।
· अस्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाना:
· कार्यप्रणाली में पारदर्शिता: बैठकों और निर्णय प्रक्रिया को और खोलना।
बाधा: कोई भी सुधार P5 की सहमति के बिना असंभव है, क्योंकि इसके लिए UN चार्टर में संशोधन की जरूरत है। कोई भी स्थायी सदस्य अपनी विशेषाधिकार छोड़ना नहीं चाहता।
निष्कर्ष: एक अपूर्ण परन्तु अपरिहार्य संस्था
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद एक विरोधाभासी संस्था है। एक तरफ, यह अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा का कानूनी रूप से सबसे मजबूत स्तंभ है, जिसने कई संघर्षों को बढ़ने से रोका है। दूसरी ओर, यह राजनीतिक गतिरोध और असमानता का प्रतीक भी बन गई है।
सच यह है कि वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में, सुरक्षा परिषद के बिना काम चलना मुश्किल है। यह देशों के बीच टकराव को नियंत्रित करने का एकमात्र ऐसा मंच है जिसकी कानूनी वैधता सर्वमान्य है। हालांकि, 21वीं सदी की चुनौतियों का सामना करने के लिए इसे अवश्य ही अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण, लोकतांत्रिक और जवाबदेह बनाना होगा। इसका भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि विश्व समुदाय, विशेषकर P5 देश, वैश्विक हित को अपने राष्ट्रीय हित से ऊपर रखने की इच्छाशक्ति कब दिखाते हैं।
---
परीक्षा/प्रतियोगिता के लिए महत्वपूर्ण तथ्य:
· अध्यक्षता: परिषद की अध्यक्षता हर महीने सदस्य देशों के बीच बारी-बारी से बदलती है (अंग्रेजी वर्णमाला के क्रम में)।
· मतदान: प्रक्रियात्मक मामलों के लिए 15 में से 9 सदस्यों के सकारात्मक वोट चाहिए। गंभीर मामलों (अध्याय VII) के लिए 9 वोटों के साथ-साथ P5 के सभी सदस्यों की सहमति जरूरी है (बशर्ते कोई वीटो न करे)।
· भारत और UNSC: भारत अब तक 8 बार अस्थायी सदस्य रह चुका है (2021-22 में अंतिम बार)। भारत स्थायी सदस्यता के लिए G4 देशों का नेतृत्व कर रहा है।
· याद रखें: UNSC का मुख्यालय न्यूयॉर्क, USA में है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC): अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
मूल बातें
1. सुरक्षा परिषद क्या है?
सुरक्षा परिषद संयुक्त राष्ट्र का सबसे शक्तिशाली अंग है, जो अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए प्राथमिक रूप से जिम्मेदार है। यह संकट की स्थितियों में कार्रवाई करने, प्रतिबंध लगाने और शांति सैनिक भेजने का अधिकार रखती है।
2. इसमें कितने सदस्य होते हैं?
सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य होते हैं:
· 5 स्थायी सदस्य: अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस।
· 10 अस्थायी सदस्य: संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा दो साल के कार्यकाल के लिए चुने जाते हैं।
3. स्थायी और अस्थायी सदस्य में क्या अंतर है?
· स्थायी सदस्य: हमेशा सदस्य रहते हैं और उनके पास वीटो पावर (निषेधाधिकार) होता है।
· अस्थायी सदस्य: केवल दो साल के लिए चुने जाते हैं और उनके पास वीटो पावर नहीं होती।
वीटो पावर के बारे में
4. 'वीटो पावर' क्या है?
वीटो पावर का अर्थ है "मैं मना करता हूं"। यह पांच स्थायी सदस्यों को मिली वह शक्ति है जिसके द्वारा वह अकेला ही किसी भी महत्वपूर्ण प्रस्ताव को रद्द कर सकता है, चाहे बाकी के 14 सदस्य उसका समर्थन कर रहे हों।
5. वीटो कब और क्यों दिया जाता है?
वीटो का उपयोग अक्सर राजनीतिक और रणनीतिक हितों की रक्षा के लिए किया जाता है। उदाहरण:
· सीरिया संकट: रूस ने अपने मित्र देश सीरिया की सरकार के खिलाफ कार्रवाई के प्रस्तावों पर वीटो लगाया।
· इजराइल-फिलिस्तीन: अमेरिका ने इजराइल की आलोचना वाले प्रस्तावों पर वीटो लगाया है।
6. क्या वीटो पावर समस्याएं पैदा करती है?
हाँ। इसके कारण:
· गतिरोध: एक देश पूरी दुनिया की इच्छा को रोक सकता है।
· असमानता: यह संयुक्त राष्ट्र के सिद्धांत "सभी राष्ट्र समान हैं" के विपरीत है।
· मानवीय संकट: कभी-कभी नरसंहार जैसे मामलों में भी त्वरित कार्रवाई नहीं हो पाती।
कार्य और शक्तियाँ
7. सुरक्षा परिषद क्या-क्या कर सकती है?
1. शांति वार्ता: विवादों का शांतिपूर्ण समाधान कराना।
2. प्रतिबंध: आर्थिक प्रतिबंध, हथियारों पर प्रतिबंध आदि लगाना।
3. सैन्य कार्रवाई: संयुक्त सैन्य बल का गठन कर आक्रमणकारी के खिलाफ कार्रवाई का आदेश देना (अध्याय VII के तहत)।
4. शांति सैनिक भेजना: संघर्ष क्षेत्रों में शांति रक्षा मिशन तैनात करना।
5. अंतर्राष्ट्रीय अपराध अदालतें: गठन करना (जैसे रवांडा और यूगोस्लाविया के लिए)।
8. क्या कोई देश सुरक्षा परिषद के फैसले को अनदेखा कर सकता है?
तकनीकी रूप से नहीं। सुरक्षा परिषद के फैसले सभी सदस्य देशों के लिए बाध्यकारी होते हैं। लेकिन व्यवहार में, शक्तिशाली देश या उनके मित्र देश कभी-कभी इन्हें अनदेखा कर देते हैं, जैसे इजराइल ने कई बार किया है।
आलोचनाएं और विवाद
9. सुरक्षा परिषद की मुख्य आलोचनाएं क्या हैं?
· पुरानी संरचना: यह 1945 की दुनिया को दर्शाती है, जबकि आज की दुनिया बदल चुकी है।
· अप्रतिनिधित्व: भारत, जापान, जर्मनी, ब्राजील जैसे बड़े देशों और पूरे अफ्रीका महाद्वीप का कोई स्थायी प्रतिनिधित्व नहीं है।
· चुनिंदा हस्तक्षेप: कुछ संकटों (जैसे लीबिया) में तुरंत कार्रवाई, जबकि अन्य (जैसे यमन, पलेस्टीन) में निष्क्रियता।
· वीटो का दुरुपयोग: राष्ट्रीय हितों को वैश्विक हित से ऊपर रखना।
10. क्या सुरक्षा परिषद नरसंहार रोकने में विफल रही है?
दुर्भाग्य से, हाँ। सबसे कुख्यात उदाहरण हैं:
· रवांडा (1994): लगभग 8 लाख लोगों के नरसंहार के दौरान कारगर कार्रवाई नहीं की।
· स्रेब्रेनित्सा (1995): संयुक्त राष्ट्र के "सुरक्षित क्षेत्र" में 8000 से अधिक लोगों की हत्या हुई।
सुधार और भविष्य
11. सुरक्षा परिषद सुधार की क्यों बात होती है?
क्योंकि यह 21वीं सदी की वैश्विक राजनीतिक वास्तविकता को प्रतिबिंबित नहीं करती। अधिक प्रतिनिधित्व और लोकतंत्र की जरूरत है।
12. सुधार के मुख्य प्रस्ताव क्या हैं?
· स्थायी सदस्यता का विस्तार: नए स्थायी सदस्यों को शामिल करना। G4 देश (भारत, ब्राजील, जर्मनी, जापान) इसका प्रमुख दावा करते हैं।
· वीटो में सुधार: वीटो को खत्म करना या उसके उपयोग पर रोक लगाना (खासकर नरसंहार जैसे मामलों में)।
· अस्थायी सीटों की संख्या बढ़ाना।
· कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाना।
13. सुधार में सबसे बड़ी बाधा क्या है?
सुधार के लिए UN चार्टर में संशोधन की आवश्यकता है, जिसके लिए P5 सहित दो-तिहाई सदस्यों की सहमति चाहिए। समस्या यह है कि कोई भी स्थायी सदस्य अपनी वीटो शक्ति छोड़ना नहीं चाहता या नए प्रतिद्वंद्वियों को शक्ति देना नहीं चाहता।
14. क्या भारत स्थायी सदस्य बन सकता है?
भारत लंबे समय से स्थायी सदस्यता का दावा कर रहा है। इसके पक्ष में तर्क हैं:
· दुनिया की सबसे बड़ी लोकतंत्र और दूसरी सबसे बड़ी आबादी।
· विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था।
· संयुक्त राष्ट्र के शांति मिशनों में सबसे अधिक सहायता और भागीदारी करने वाला देश।
· एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति।
लेकिन इसके लिए सुरक्षा परिषद सुधार होना जरूरी है, और चीन व पाकिस्तान जैसे देशों का विरोध एक चुनौती है।
वर्तमान संदर्भ
15. यूक्रेन युद्ध में सुरक्षा परिषद की भूमिका क्या रही?
यूक्रेन पर रूस के आक्रमण (2022) ने सुरक्षा परिषद की सीमाएं उजागर कर दीं। चूंकि रूस एक स्थायी सदस्य है, उसने अपने खिलाफ किसी भी महत्वपूर्ण प्रस्ताव को वीटो कर दिया। इसलिए, सुरक्षा परिषद कार्रवाई करने में असमर्थ रही, और मामला संयुक्त राष्ट्र महासभा में ले जाया गया।
16. क्या सुरक्षा परिषद आज भी प्रासंगिक है?
हाँ, लेकिन सीमित रूप में। यह अभी भी अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए एकमात्र कानूनी रूप से बाध्यकारी निर्णय लेने वाला निकाय है। हालांकि, इसकी विश्वसनीयता और प्रभावशीलता वीटो-संचालित गतिरोध और राजनीतिकरण के कारण कम हुई है। भविष्य में इसकी प्रासंगिकता सुधारों पर निर्भर करेगी।
---

